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कबीर के राम

संत कबीर दास जी के राम 


संत कबीर दास जी का नाम पंद्रहवी सदी के संतों में सर्वोपरि माना जाता है कुइंकी ऐसा माना जाता है की श्री गुरुनानक देव जी एवं संत रविदास जी इन दोनों के ही गुरु कबीरदास जी थे | आधुनिक भारत के बहुत से विद्वान तो संत रवि दास जी को संत शिरोमणि की उपमा देते है तब आप स्वयं ही रविदास जी के गुरु की महिमा का अंदाजा लगा सकते हैं |
कबीरदास जी ने अपनी समस्त वाणी में राम नाम का कहीं न कहीं प्रयोग अवश्य किया है जैसे :

जीव सिव  सब प्रगटे, वे ठाकुर सब दास । 
कबीर और जाने नहीं, एक राम नाम की आस ॥ 
 
सगुण राम और निर्गुण रामा, इनके पार सोई मम नामा । 
सोई नाम सुख जीवन दाता, मै सबसों कहता यह बाता ॥
 
घट घट राम बसत हैं भाई, बिना ज्ञान नहीं देत दिखाई। 
आतम ज्ञान जाहि घट होई, आतम राम को चीन्है सोई।
 
 संत कबीर जी के अनुसार वे जिस राम की बात करते हैं वे दशरथ पुत्र राम नही बल्कि वे तो कोई और ही राम है | कबीर जी आत्म राम को भी राम कहते हैं और निर्गुण निराकार को भी राम नाम से ही संबोधित कर रहे हैं वहीँ यह भी कहते हैं की इन दोनों सगुन और निर्गुण के पार या इतर जो राम हैं वाही मेरे राम हैं | जैसे देखिये निम्न दोहा 

चार राम हैं जगत में, तीन राम व्यवहार ।  
चौथ राम सो सार है, ताका करो विचार ॥
 
निर्गुण राम निरंजन राया, जिन वह सकल श्रृष्टि उपजाया । 
निगुण सगुन दोउ से न्यारा, कहैं कबीर सो राम हमारा ॥
 
और एक हम हैं की असल राम को न पहचानकर उसे मंदिरों में ढूंड रहे हैं , मंदिर के लिए लड़ रहे हैं | क्या हमारे राम कबीर जी के राम से भिन्न हैं , और यदि हाँ तब तो बहुत से राम हुए हैं परन्तु प्रचलित एवं प्रसिद्ध केवल दशरथ नंदन राम ही हुए हैं .........

 

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